ढोल-नगाड़ों की थाप पर थिरका चक्रधरपुर, विश्व आदिवासी दिवस पर उमड़ा जनसैलाब
- Rahul
- 2 दिन पहले
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बिरसा के विचारों से गूंजा शहर, हजारों कदमों ने जल-जंगल-जमीन और संस्कृति संरक्षण का दिया संदेश

चक्रधरपुर: रविवार को चक्रधरपुर की सड़कें पारंपरिक मांदर, नगाड़ों और तीर-कमान की झांकी से गूंज उठीं, जब हजारों आदिवासी महिला-पुरुष, युवा और बच्चे विश्व आदिवासी दिवस के अवसर पर एकजुट होकर अपनी संस्कृति और अस्मिता का उत्सव मनाने निकले। हो, मुंडा, संथाल, उरांव, भूमिज और महली समाज की रंग-बिरंगी वेशभूषा ने पूरे शहर को आदिवासी संस्कृति के रंग में रंग दिया।

आदिवासी समन्वय समिति की आयोजन समिति के बैनर तले कार्यक्रम की शुरुआत पोटका स्थित आदिवासी मित्र मंडल से हुई। सबसे पहले धरती आबा भगवान बिरसा मुंडा को श्रद्धासुमन अर्पित किए गए, जिसके बाद दियुरी ने पारंपरिक रीति-रिवाज से पूजा-अर्चना कर समारोह का शुभारंभ कराया। इसके बाद मांदर और नगाड़ों की थाप पर विशाल शोभायात्रा रवाना हुई।
शहर की गलियों में उतरी संस्कृति की जीवंत तस्वीर
शोभायात्रा पोटका से एनएच-75, इतवारी बाजार, ओवरब्रिज, पवन चौक, भगत सिंह चौक और फॉरेस्ट चेकनाका होते हुए मानकी-मुंडा सभागार के समीप बिरसा स्मारक पहुंची। यहां भगवान बिरसा मुंडा की प्रतिमा पर माल्यार्पण कर उनके संघर्ष और बलिदान को नमन किया गया। पूरे मार्ग में लोगों ने जगह-जगह पुष्पवर्षा कर रैली का स्वागत किया।

पोड़ाहाट स्टेडियम बना आदिवासी संस्कृति का मंच
शोभायात्रा के समापन के बाद पोड़ाहाट स्टेडियम में भव्य सांस्कृतिक समारोह आयोजित हुआ। सूर्या नर्सिंग कॉलेज, सोना गागराई ग्रुप, मारवाड़ी प्लस टू स्कूल, राजकुमारी ग्रुप दलकी समेत कई सांस्कृतिक दलों ने पारंपरिक नृत्य और गीतों की मनमोहक प्रस्तुतियां दीं। मांदर की लय और लोकगीतों की गूंज से पूरा स्टेडियम देर तक झूमता रहा।

समाज सुधार और शिक्षा पर दिया गया जोर
समारोह में वक्ताओं ने जल, जंगल और जमीन की रक्षा के साथ आदिवासी भाषा, संस्कृति और परंपराओं को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का आह्वान किया। साथ ही नशापान, अंधविश्वास और सामाजिक कुरीतियों से दूर रहकर शिक्षा और सामाजिक विकास को अपनाने की अपील की गई।

जनप्रतिनिधियों की रही मौजूदगी
कार्यक्रम में खरसावां विधायक दशरथ गागराई, पूर्व विधायक बहादुर उरांव, शशिभूषण सामाड, प्रखंड प्रमुख ज्योति सिजुई, जिला परिषद सदस्य मीना जोंकों सहित कई जनप्रतिनिधि एवं सामाजिक कार्यकर्ता उपस्थित रहे।
विश्व आदिवासी दिवस का यह आयोजन केवल एक सांस्कृतिक उत्सव नहीं, बल्कि अपनी पहचान, प्रकृति और विरासत को सहेजने का सामूहिक संकल्प बनकर सामने आया।





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