गुरूजी विशेष : महाजनी प्रथा के खिलाफ उलगुलान ने बनाया दिशोम गुरू, अलग राज्य का सपना भी किया साकार, चार दशक तक राजनीति में एकछत्र राज
- Upendra Gupta
- 4 अग॰ 2025
- 3 मिनट पठन
उपेंद्र गुप्ता

रांची ( RANCHI) : दिशोम गुरू शिबू सोरेन का सोमवार की सुबह करीब 9 बजे लंबी बिमारी के बाद निधन हो गया. उनके निधन से पूरे राज्य में शोक की लहर फैल गई. गुरूजी के जाने के बाद उनका जो स्थान खाली हुआ है,उसे भर पाना फिलहाल तो संभव नहीं दिखता, भविष्य में भी इनके जैसे संघर्षशील और लड़ाकू व्यक्तित्व शायद ही झारखंड को मिल पाएगा. आदिवासियों के लिए गुरूजी किसी भगवान से तनिक भी कम नहीं थे, वे सर्वमान्य नेता थे, जिन्हें आदिवासी समाज अपना सबसे बड़ा संरक्षक मानता था, तो गैरआदिवासी समाज भी उन्हें उतने ही सम्मान के भाव से देखता था. उनकी कहानी भी जितना दिलचस्प है, उतना ही प्रेरणादायक भी. एक आदिवासी युवक शिवचरण से दिशोम गुरू कैसे बनें इसके पीछे उनका लंबा संघर्ष है.
संथाल आदिवासी परिवार में हुआ जन्म
गुरूजी का जन्म वर्तमान रामगढ़ जिले के गोला प्रखंड के नेमरा गांव में एक संथाल आदिवासी परिवार में 11 जनवरी 1944 को हुआ था, उनके पिता सोबरन सोरेन गांधीवादी विचार धारा के किसान थे. बचपन में गुरूजी का नाम शिवचरण मांझी था. प्यार से उन्हें शिवलाल कहकर भी लोग पुकारते थे. गांव की एक घटना ने शिवलाल को ऐसा जुझारू और लड़ाकू आंदोलन कारी बना दिया, जिसकी आज भी मिसाल कायम है.
पिता की हत्या ने बदल दी गुरूजी की जिंदगी
गुरूजी जब महज 13 साल के थे, तब उनके पिता सोबरन सोरेन की हत्या गांव के महाजनों ने कर दी. पिता की हत्या से गुरूजी इतने मर्माहत हुए कि उन्होंने पढ़ाई छोड़ कर महाजनों के खिलाफ जंग छेड़ दिया, गांव के लोगों को एकजूट किया, फिर आस-पास के इलाके गोला,पेटरवार,जैनामोड़,बोकारो के लोगों को महाजनों के खिलाफ आंदोलन के लिए तैयार किया. महाजनों के शोषण और अत्याचार के कारण आदिवासियों में नाराजगी तो पहले से ही थी. इसलिए गुरूजी के आंदोलन में धीरे-धीरे बड़ी संख्या में आदिवासी एकजूट हो गए.

महाजनी प्रथा के खिलाफ गुरूजी का उलगुलान
उस दौर में इन इलाकों में महाजनों का काफी दबदबा था, महाजन शराब पिलाकर आदिवासियों की जमीन सादे कागज पर लिखवा लेते थे और कर्ज से दबे होने के कारण आदिवासी उनका विरोध नहीं कर पाते थे, लेकिन गुरूजी ने साहस करके महाजनों के खिलाफ दिवासियों को इतनी मजबूती से खड़ा किया कि महाजनों की नींव हिल गई, आदिवासियों विरोध के सामने वे लोग टिक नहीं पाए. आदिवासियों की हड़पी गई जमीन वापस मिलने लगी. महाजनों के खिलाफ आंदोलन का गुरूजी के जीवन में बड़ा प्रभाव डाला, गुरूजी ने सिर्फ जमीन का आंदोलन ही नहीं किया, बल्कि नशा के खिलाफ भी आंदोलन चलाया, आदिवासी समाज में प्रचलित हड़िया-दारू के सेवन खिलाफ भी काफी मुखर हुए, इस समाज सुधार आंदोलन के कारण उन्हें एक नई पहचान मिली और धनबाद, गिरिडीह, बोकारो, हजारीबाग इलाके में आदिवासी समाज उन्हें भगवान की तरह पूजने लगे और यहीं से वे दिशोम गुरू के बन गए.

समाजिक आंदोलन के बाद राजनीति में रखा कदम
समाजिक आंदोलन की सफलता के बाद गुरूजी को काफी प्रसिद्धि मिली उसके बाद उन्होंने राजनीति में कदम रखा, 1972 में पहली बार जरीडीह से विधानसभा का चुनाव भी लड़ा था.लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली. 1977 में फिर लोकसभा का चुनाव लड़ा,इस बार भी उन्हें सफलता नहीं मिली, लेकिन 1980 में लोकसभा चुनाव में पहली बार सफलता मिली और सांसद बन गए, इसके बाद तो उन्होंने पीछे मुड़ कर भी नहीं देखा और फिर लगातार 1989,1991,1996,2004,2009 और 2014 में जीत दर्ज की. 2004 में मनमोहन सिंह की सरकार में मंत्री भी रहे.
अलग राज्य आंदोलन की संभाली कमान
समाजिक आंदोलन और राजनीति में मिली सफलता से गुरूजी के हौसले इतने बुलंद हो चुके थे कि उन्होंने आदिवासियों के सर्वांगीण विकास के लिए अलग राज्य की मांग शुरू कर दी, अलग राज्य की मांग धीरे-धीरे जोर पकड़ने लगा और एक समय ऐसा आया कि झारखंड राज्य का निर्माण हो भी हो गया और आज झारखंड 24 साल का भी हो गया. अलग राज्य का निर्माण में गुरूजी के योगदान और बलिदान स्वर्ण अक्षरों में लिखा जा चुका है.

तीन बार सीएम बनें गुरूजी
अलग राज्य बनने के बाद गुरूजी का सपना पहले मुख्यमंत्री बनने का पूरा तो नहीं हुआ, लेकिन थोड़े-थोड़े अंतराल पर वे तीन बार सीएम जरूर बनें, उसके बाद उनके उत्तराधिकारी के रूप में उनके बेटे हेमंत सोरेन राज्य के सीएम की कुर्सी पर विराजमान है और उनके सपने को पूरा करने में जुटे हैं. गुरूजी तीसरे सीएम के रूप में पहली बार मार्च 2005 को पदभार संभाला, लेकिन दस दिन में ही विधानसभा में पूर्ण बहुंमत नहीं मिलने के कारण कुर्सी छोड़नी पड़ी. दोबारा 2008 में लगभग साढ़े चार माह ही गद्दी पर रहे, तीसरी बार भी केवल पांच-छ: माह ही सीएम रहे.





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