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78 दिन के बोनस का ऐलान, लेकिन जेब में सिर्फ ₹17,951! क्या ₹73,895 की जगह ₹17,951 दिया जा रहा है बोनस ? 

लेखक की तस्वीर: Rahul
Rahul
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प्रतीकात्मक तस्वीर
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चक्रधरपुर: रेलवे की सुरक्षित और सुचारु व्यवस्था चलाने में दिन-रात जुटे कर्मचारियों के लिए 78 दिनों के उत्पादकता आधारित बोनस (PLB) की घोषणा हुई है। लेकिन इस घोषणा के पीछे छिपी गणना ने कर्मचारियों के बीच असंतोष पैदा कर दिया है। सवाल यह है कि जब रेलवे में न्यूनतम शुरुआती मूल वेतन ₹18,000 है, तो बोनस की गणना आज भी ₹7,000 की सीमा के आधार पर क्यों की जा रही है?


केंद्र सरकार ने वित्त वर्ष 2025-26 के लिए पात्र रेलकर्मियों को 78 दिनों के बराबर बोनस देने की घोषणा की है। निर्धारित गणना के अनुसार अधिकतम बोनस ₹17,951 है। पहली नजर में 78 दिनों का बोनस सुनने में अच्छा लगता है, लेकिन वास्तविकता यह है कि इसकी गणना कर्मचारियों के मौजूदा मूल वेतन के बजाय पुरानी निर्धारित सीमा पर आधारित है।


₹18,000 के मूल वेतन पर तुलना कीजिए


यदि किसी रेलकर्मी का न्यूनतम मूल वेतन ₹18,000 है, तो केवल मूल वेतन के आधार पर 78 दिनों की आनुपातिक राशि करीब ₹46,184 बैठती है। यदि उदाहरण के लिए मूल वेतन में 60 प्रतिशत महंगाई भत्ता जोड़कर ₹28,800 का मासिक आधार लिया जाए, तो 78 दिनों की राशि करीब ₹73,895 होगी। इसके मुकाबले घोषित अधिकतम PLB ₹17,951 ही है।


हालांकि, यह अंतर एक तुलनात्मक गणना है, वास्तविक कानूनी बोनस का दावा नहीं। PLB की पात्रता और गणना सरकार के निर्धारित नियमों के अनुसार होती है। लेकिन यही तुलना पुरानी सीमा को लेकर उठ रहे सवालों को सामने लाती है।


मेहनत पूरी, लेकिन बोनस की गणना पुरानी सीमा पर!


रेलवे कर्मचारी केवल बोनस की रकम नहीं देख रहे, बल्कि अपनी मेहनत के मूल्यांकन पर भी सवाल उठा रहे हैं। ट्रेनों का संचालन, पटरियों का रखरखाव, सिग्नल व्यवस्था, कोचों की मरम्मत और यात्रियों की सुरक्षा जैसे महत्वपूर्ण कार्यों में लगे कर्मचारियों को उम्मीद थी कि बोनस की गणना में बढ़ती महंगाई और वर्तमान वेतनमान का असर दिखाई देगा।


कर्मचारियों के बीच यह भावना भी है कि 78 दिनों के बोनस का प्रचार तो बड़े उत्साह से किया जाता है, लेकिन जब राशि खाते में आती है, तो उम्मीद और हकीकत के बीच बड़ा अंतर नजर आता है। ऐसे में उन्हें लगता है कि बोनस के नाम पर उनके साथ न्याय नहीं हो रहा।


NFIR ने उठाई सीलिंग बढ़ाने की मांग


नेशनल फेडरेशन ऑफ इंडियन रेलवेमेन (NFIR) ने ₹7,000 की गणना सीमा बढ़ाने के लिए प्रधानमंत्री, रेल मंत्री और वित्त मंत्री को पत्र लिखा है। फेडरेशन को उम्मीद है कि आठवें केंद्रीय वेतन आयोग के संदर्भ में बोनस के नियमों की समीक्षा और आवश्यक संशोधन का रास्ता खुल सकता है।


अब सवाल सरकार से है: जब कर्मचारियों का मूल वेतन ₹18,000 से शुरू होता है और महंगाई लगातार बढ़ रही है, तो बोनस की गणना की सीमा ₹7,000 पर क्यों बनी हुई है? क्या 78 दिनों के बोनस की घोषणा तभी सार्थक होगी, जब उसकी गणना का आधार भी मौजूदा आर्थिक वास्तविकताओं के अनुरूप बदलेगा?


रेलवे कर्मचारियों को केवल बोनस की घोषणा नहीं, बल्कि उनकी मेहनत के अनुरूप पारदर्शी और न्यायसंगत गणना की उम्मीद है।

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