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चक्रधरपुर रेल मंडल की पार्किंग व्यवस्था फिर कटघरे में, राउरकेला स्टेशन का ठेका सरेंडर; ठेकेदार बोला- रोज ₹20 हजार का घाटा, रेलवे ने नहीं दिया सहयोग

  • लेखक की तस्वीर: Rahul
    Rahul
  • 1 दिन पहले
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राउरकेला स्टेशन की पार्किंग हुई मुफ्त, ठेकेदार ने समेटा सामान; टेंडर प्रक्रिया और रेलवे की कार्यप्रणाली पर उठे गंभीर सवाल



राउरकेला: चक्रधरपुर रेल मंडल की पार्किंग व्यवस्था एक बार फिर विवादों के केंद्र में आ गई है। इस बार मामला राउरकेला रेलवे स्टेशन की पार्किंग का है, जहां पार्किंग संचालित कर रही ठेका कंपनी ने लगातार हो रहे भारी आर्थिक नुकसान और रेलवे के कथित असहयोग से तंग आकर बुधवार रात अपना ठेका सरेंडर कर दिया। ठेकेदार का दावा है कि उसे प्रतिदिन करीब 20 हजार रुपये का नुकसान उठाना पड़ रहा था, जबकि रेलवे ने समस्याओं के समाधान के नाम पर केवल आश्वासन दिए, लेकिन कोई ठोस कदम नहीं उठाया।


ठेकेदार के अनुसार उसने तीन वर्षों के लिए पार्किंग का ठेका लिया था, लेकिन पार्किंग संचालन के लिए टेंडर में जिन सुविधाओं और जगह का उल्लेख किया गया था, वह पूरी तरह उपलब्ध नहीं कराई गई। इसके कारण पार्किंग संचालन घाटे का सौदा बन गया। बार-बार रेलवे अधिकारियों से शिकायत करने के बावजूद स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ। अंततः कंपनी ने ठेका छोड़ने का फैसला लिया और बुधवार रात ही सभी औपचारिकताएं पूरी कर पार्किंग स्थल से अपने संसाधन भी हटा लिए।



हमेशा विवादों में रही है चक्रधरपुर रेल मंडल की पार्किंग


चक्रधरपुर रेल मंडल में पार्किंग व्यवस्था लंबे समय से विवादों में रही है। मंडल के दो प्रमुख स्टेशन टाटानगर और राउरकेला में पार्किंग को लेकर लगातार शिकायतें सामने आती रही हैं। यात्रियों ने कई बार पार्किंग संचालकों पर निर्धारित दर से अधिक शुल्क वसूलने, नियमों के विरुद्ध पैसे लेने, अभद्र व्यवहार, मारपीट और विवाद करने जैसे आरोप लगाए हैं। पार्किंग को लेकर कई बार यात्रियों और ठेका कर्मियों के बीच झड़प की घटनाएं भी सामने आई हैं।



रेलवे की टेंडर नीति पर उठे सवाल


राउरकेला पार्किंग ठेका सरेंडर होने के बाद सबसे बड़ा सवाल रेलवे की टेंडर प्रक्रिया पर खड़ा हो गया है। जानकारों का कहना है कि रेलवे ने पार्किंग से होने वाली वास्तविक आय का वैज्ञानिक आकलन किए बिना ही अत्यधिक लाइसेंस शुल्क निर्धारित कर दिया। परिणामस्वरूप ठेकेदारों की कमाई से कहीं अधिक राशि रेलवे को देनी पड़ रही है और उन्हें भारी घाटा उठाना पड़ रहा है। ठेका कम्पनी के प्रतिनिधि ने बताया की वे प्रत्येक दिन रेलवे को 30 हजार रुपये का भुगतान कर रहे हैं लेकिन कमाई मात्र दस हजार रुपे से भी कम है।  



प्रश्न यह भी उठ रहा है कि क्या रेलवे ने टेंडर जारी करने से पहले पार्किंग की वास्तविक क्षमता, वाहन संख्या और संभावित आय का कोई सर्वे कराया था? यदि ऐसा किया गया होता तो शायद इतनी बड़ी आर्थिक असंतुलन की स्थिति उत्पन्न नहीं होती। रेलवे के गलत शुल्क निर्णय ने रेल यात्रियों को परेशानी में धकेला, आये दिन यात्रियों को पार्किंग को लेकर झड़प बहस मारपीट जैसी घटनाओं का सामना करना पड़ा। ठेकेदार को भी भारी नुकसान उठाना पड़ा है। कुल मिलाकर कहा जाए तो रेलवे स्टेशन में पार्किंग व्यवस्था सुदृढ़ करने और यात्रयों को सुविधा देने में नाकाम रही है। ठेकेदार का भी नुकसान कराया।


ठेकेदार ने मांगी सुरक्षा राशि की वापसी


ठेका कंपनी ने पार्किंग सरेंडर करने के साथ ही रेलवे से अपनी जमा अमानत राशि और सुरक्षा जमानत वापस करने की मांग की है। कंपनी का कहना है कि रेलवे के असहयोग और अव्यवहारिक टेंडर शर्तों के कारण उसे भारी नुकसान उठाना पड़ा है, इसलिए वह अब इस व्यवस्था को आगे नहीं चला सकती।



रेल मंडल की कार्यप्रणाली पर फिर सवाल


राउरकेला पार्किंग ठेका सरेंडर की घटना ने एक बार फिर चक्रधरपुर रेल मंडल की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। एक ओर रेलवे यात्रियों को बेहतर सुविधाएं देने का दावा करता है, वहीं दूसरी ओर पार्किंग जैसी बुनियादी व्यवस्था भी विवादों और अव्यवस्था से घिरी हुई है। अब देखना होगा कि रेलवे इस मामले में क्या कदम उठाता है और भविष्य में पार्किंग व्यवस्था को किस तरह पारदर्शी, व्यावहारिक और यात्रियों के हित में संचालित करता है।

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