20 साल बाद चक्रधरपुर पहुंचे शिवगोपाल, क्या बिखरी मेंस यूनियन को फिर एकजुट कर पाएगा ‘ब्रांड शिवगोपाल’?
महाधिवेशन में निजीकरण के खिलाफ हुंकार, लेकिन जमीनी हकीकत में गुटबाजी, गिरती साख और कर्मचारियों की नाराजगी बड़ी चुनौती

संवाददाता,राउरकेला (देव कुमार डे): दक्षिण पूर्व रेलवे मेंस यूनियन (SERMU) का चक्रधरपुर महाधिवेशन महज एक संगठनात्मक कार्यक्रम बनकर नहीं रह गया। करीब दो दशक बाद ऑल इंडिया रेलवे फेडरेशन (AIRF) के राष्ट्रीय महासचिव शिवगोपाल मिश्रा का चक्रधरपुर पहुंचना ऐसे समय हुआ है, जब मंडल में यूनियन की पकड़, आंतरिक एकजुटता और कर्मचारियों के बीच उसकी विश्वसनीयता को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। ऐसे में इस महाधिवेशन को संगठन की खोई राजनीतिक जमीन वापस हासिल करने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।
महाधिवेशन के मंच से शिवगोपाल मिश्रा ने रेलवे के निजीकरण और ठेकेदारी व्यवस्था के खिलाफ जोरदार आवाज उठाई। कर्मचारियों के अधिकारों और संगठन की मजबूती की बात भी कही। लेकिन दूसरी ओर चक्रधरपुर मंडल की जमीनी तस्वीर कई असहज सवाल खड़े करती है। रेल कर्मचारियों के बीच चर्चा है कि स्थानीय स्तर पर यूनियन के कुछ प्रतिनिधियों और पदाधिकारियों की भूमिका कर्मचारियों के अधिकारों की लड़ाई से अधिक प्रशासन और ठेका व्यवस्था के साथ समन्वय तक सीमित होती जा रही है। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन कर्मचारियों के बीच ऐसी चर्चाएं संगठन के लिए निश्चित रूप से चिंता का विषय हैं।
‘ब्रांड शिवगोपाल’ बनाम स्थानीय नेतृत्व की चुनौती
शिवगोपाल मिश्रा का राष्ट्रीय स्तर पर लंबा संगठनात्मक अनुभव और प्रभाव SERMU की सबसे बड़ी ताकत माना जाता है। लेकिन सवाल यह है कि क्या केंद्रीय नेतृत्व का प्रभाव स्थानीय स्तर पर संगठन की कमजोर होती पकड़ को फिर मजबूत कर पाएगा?
चक्रधरपुर मंडल के टाटानगर से लेकर डांगुआपोसी तक कर्मचारियों के बीच यूनियन के स्थानीय नेतृत्व को लेकर असंतोष की चर्चा लगातार सामने आती रही है। कर्मचारियों का एक वर्ग आरोप लगाता है कि HRA, इंसेंटिव, पदोन्नति, तबादले, ड्यूटी आवर्स और कार्यस्थल की समस्याओं जैसे मुद्दों पर उन्हें अपेक्षित स्तर की आवाज नहीं मिल रही है।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब एक रेलकर्मी अपनी जायज मांग के लिए यूनियन कार्यालय के चक्कर लगाने को मजबूर हो, तो फिर संगठन की जमीनी उपयोगिता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

गुटबाजी बनी सबसे बड़ी चुनौती
SERMU की गिरती साख के पीछे सबसे गंभीर कारणों में संगठनात्मक गुटबाजी को माना जा रहा है। चक्रधरपुर मंडल में अलग-अलग गुटों के बीच खींचतान और वर्चस्व की राजनीति की चर्चा अब कर्मचारियों के बीच भी होने लगी है।
महत्वपूर्ण बात यह भी है कि जिन कार्यकर्ताओं ने वर्षों तक संगठन को जमीन पर मजबूत करने में भूमिका निभाई, उनमें से कई को पिछले कुछ समय में अपेक्षित संगठनात्मक जिम्मेदारी या महत्व नहीं मिलने की नाराजगी बताई जाती है। इसका असर संगठन के निचले स्तर तक दिखाई देने की चर्चा है।
ऐसे में महाधिवेशन के मंच से शिवगोपाल मिश्रा का बार-बार अनुशासन, एकजुटता और सभी को साथ लेकर चलने का संदेश अपने आप में महत्वपूर्ण संकेत माना जा रहा है। क्योंकि किसी शीर्ष नेता को सार्वजनिक मंच से संगठन को एकजुट रहने की बार-बार अपील करनी पड़े, तो यह संगठन के भीतर मौजूद मतभेदों की गहराई की ओर इशारा करता है।
20 साल का इंतजार और ‘आखिरी बड़ा दांव’?
अपने संबोधन में शिवगोपाल मिश्रा ने स्वयं स्वीकार किया कि वह लगभग 20 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद चक्रधरपुर पहुंचे हैं। यही बात अब राजनीतिक और संगठनात्मक विश्लेषण के केंद्र में है।
आगामी यूनियन चुनावों को देखते हुए यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या केंद्रीय नेतृत्व ने ‘ब्रांड शिवगोपाल’ के सर्वमान्य चेहरे को चक्रधरपुर में संगठन की खोई जमीन वापस हासिल करने के लिए आगे किया है?
क्योंकि स्थानीय स्तर पर कमजोर होती पकड़ को केवल भाषणों से वापस हासिल करना आसान नहीं होगा। इसके लिए संगठन के भीतर विश्वास बहाली, गुटबाजी पर नियंत्रण, कार्यकर्ताओं को सम्मान और कर्मचारियों के वास्तविक मुद्दों पर प्रभावी संघर्ष जरूरी होगा।

रनिंग स्टाफ के रुख पर टिकी निगाहें
चक्रधरपुर मंडल में लोको पायलट, ट्रेन मैनेजर सहित रनिंग स्टाफ और तकनीकी विभागों के कर्मचारी किसी भी यूनियन के भविष्य के लिए बेहद महत्वपूर्ण माने जाते हैं। इन कर्मचारियों के बीच ड्यूटी आवर्स, माइलेज अलाउंस, सुरक्षा, तबादले और HRA जैसे मुद्दे लगातार महत्वपूर्ण बने हुए हैं।
यदि इन वर्गों के बीच यह धारणा मजबूत होती है कि यूनियन नेतृत्व कर्मचारियों के बजाय अधिकारियों के अधिक करीब है, तो उसका सीधा असर आगामी सीक्रेट बैलेट चुनाव पर पड़ सकता है।
यूनियन चुनाव में भाषण नहीं, बल्कि कर्मचारियों का वोट अंतिम फैसला करेगा।
अब असली परीक्षा महाधिवेशन के बाद
चक्रधरपुर महाधिवेशन ने शिवगोपाल मिश्रा के रूप में SERMU को एक मजबूत चेहरा जरूर दिया है, लेकिन असली परीक्षा अब शुरू होगी। क्या स्थानीय नेतृत्व गुटबाजी से ऊपर उठकर संगठन को एकजुट कर पाएगा? क्या कर्मचारियों की शिकायतों को प्राथमिकता मिलेगी? क्या आरोपों और अविश्वास की जगह पारदर्शिता और जवाबदेही आएगी? और सबसे बड़ा सवाल—क्या SERMU अपने खिसकते जनाधार को फिर से वापस ला पाएगा?

करीब 20 साल बाद चक्रधरपुर पहुंचे शिवगोपाल मिश्रा ने संगठन में नई ऊर्जा भरने की कोशिश की है। लेकिन यदि स्थानीय स्तर पर पुराने विवाद, गुटबाजी और कर्मचारियों की नाराजगी दूर नहीं हुई, तो यह कोशिश भी महज एक बड़े राजनीतिक कार्यक्रम तक सीमित रह सकती है।
अब ‘ब्रांड शिवगोपाल’ की असली परीक्षा भाषणों में नहीं, बल्कि कर्मचारियों के बीच होगी। और अंतिम फैसला आने वाले सीक्रेट बैलेट के बक्से करेंगे कि दो दशक बाद आया यह ‘इंतजार’ SERMU के लिए नई शुरुआत साबित हुआ या सिर्फ एक और अधूरा राजनीतिक दांव।





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