टिकट दलाल गिरफ्तार, अब कमर्शियल स्टाफ की भूमिका की जांच की मांग

राउरकेला: राउरकेला रेलवे स्टेशन के पीआरएस काउंटर से टिकट दलाल की गिरफ्तारी के बाद अब केवल दलालों पर कार्रवाई ही नहीं, बल्कि आरक्षण काउंटरों की निगरानी और वहां तैनात कमर्शियल स्टाफ की भूमिका भी जांच के घेरे में आ गई है। लंबे समय से टिकट दलाली की शिकायतों के बावजूद यदि कोई व्यक्ति लगातार आरक्षण काउंटरों के आसपास सक्रिय रहता है, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि संबंधित कर्मचारियों और पर्यवेक्षकों की नजर इस गतिविधि पर क्यों नहीं पड़ी।
स्थानीय स्तर पर आरोप लगाए जाते रहे हैं कि कुछ टिकट दलाल नियमित रूप से आरक्षण काउंटरों पर सक्रिय रहते हैं और तत्काल टिकट की बुकिंग के समय आम यात्रियों से पहले टिकट हासिल करने की कोशिश करते हैं। यदि ये आरोप सही हैं, तो यह केवल टिकट दलालों की गतिविधि नहीं, बल्कि रेलवे की निगरानी व्यवस्था की गंभीर कमजोरी का मामला हो सकता है।
विशेष रूप से कमर्शियल विभाग के सीआई, सुपरवाइजर और काउंटर क्लर्कों की भूमिका की निष्पक्ष जांच की जरूरत है। सवाल यह है कि यदि कोई व्यक्ति प्रतिदिन काउंटर पर दिखाई देता है, तत्काल टिकटों की लगातार बुकिंग करता है और बाद में टिकट बेचने का काम करता है, तो संबंधित स्टाफ ने इसकी सूचना अपने वरिष्ठ अधिकारियों या आरपीएफ को क्यों नहीं दी?
यह भी आरोप सामने आते रहे हैं कि टिकट दलालों और कुछ कमर्शियल कर्मियों के बीच सांठगांठ के कारण दलाली को बढ़ावा मिलता है और कथित तौर पर अवैध कमाई का रास्ता बनता है। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र जांच के बाद ही सच्चाई सामने आ सकती है। बिना जांच किसी कर्मचारी को दोषी ठहराना उचित नहीं होगा।
सीसीटीवी फुटेज से खुल सकता है पूरा नेटवर्क
राउरकेला पीआरएस में लगे सीसीटीवी कैमरों की पिछले कई सप्ताह या महीनों की रिकॉर्डिंग की जांच की जाए तो यह पता लगाया जा सकता है कि कौन-कौन लोग नियमित रूप से काउंटरों पर आते रहे हैं। तत्काल टिकट खुलने के समय किन लोगों की मौजूदगी रहती है, कौन लगातार काउंटर पर टिकट बनाता है और क्या वही लोग बाद में टिकटों की बिक्री से जुड़े पाए जाते हैं—इन सभी पहलुओं की जांच सीसीटीवी और टिकट बुकिंग रिकॉर्ड के मिलान से की जा सकती है।
इसके साथ ही संबंधित काउंटरों के लॉगिन रिकॉर्ड, यूजर आईडी, टिकट बुकिंग पैटर्न और रद्द किए गए टिकटों की भी जांच जरूरी है। इससे यह स्पष्ट हो सकता है कि किसी विशेष व्यक्ति या समूह द्वारा व्यवस्थित तरीके से टिकट हासिल किए जा रहे थे या नहीं।
आरपीएफ की कार्रवाई के बाद कमर्शियल विभाग पर भी सवाल
28 सितंबर की आरपीएफ कार्रवाई में तरुण कुमार उपाध्याय की गिरफ्तारी और उसके पास से 41,882.15 रुपये मूल्य के टिकटों की बरामदगी ने टिकट दलाली के खिलाफ कार्रवाई की आवश्यकता को फिर सामने ला दिया है। आरोपी के पास दो लाइव तत्काल ई-टिकट समेत 13 पुराने ई-टिकट और अन्य सामग्री मिली है।
अब सवाल यह है कि यदि आरपीएफ कार्रवाई कर टिकट दलाल तक पहुंच सकती है, तो स्टेशन पर टिकटों की बुकिंग के दौरान निगरानी करने वाले संबंधित कमर्शियल अधिकारी और कर्मचारी ऐसी गतिविधियों को पहले क्यों नहीं पकड़ पाए?
वरीय रेलवे अधिकारियों को पूरे मामले की विभागीय स्तर पर भी जांच करानी चाहिए। जांच में यदि किसी कमर्शियल कर्मचारी की लापरवाही, मिलीभगत या आर्थिक लेन-देन के प्रमाण मिलते हैं तो नियमानुसार कार्रवाई की जानी चाहिए। वहीं यदि आरोप निराधार पाए जाते हैं तो संबंधित कर्मचारियों को भी जांच के माध्यम से अपनी भूमिका स्पष्ट करने का अवसर मिलना चाहिए।
त्योहारों के मौसम में तत्काल टिकटों की मांग बढ़ने के बीच यह जांच इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि टिकट दलाली का सीधा असर उन आम यात्रियों पर पड़ता है जो घंटों लाइन में खड़े रहने के बावजूद कन्फर्म टिकट हासिल नहीं कर पाते।





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