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कन्याओं में साक्षात विराजमान रहती है मां दुर्गा, नवरात्र में अवश्य करें कन्या पूजन, जानिए पूरी विधि व महत्व  

30 सित. 2025

2 मिनट का लेख

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 न्यूज डेस्क

रांची ( RANCHI) : हिंदू धर्म में नवरात्रि के पवित्र त्योहार में देवी दुर्गा के नौ रूपों की पूजा की जाती है. इन नौ दिनों में लोग व्रत रखते हैं और भक्तिभाव से मां की पूजा करते हैं. शक्ति की साधना और देवी की आराधना के प्रतीक पर्व का समापन नौवें दिन होता है. इसके पहले कन्या पूजन अष्टमी और नवमी तिथि को करने की परंपरा है. शास्त्रों में भी कन्या पूजन को अत्यंत शुभ और महत्वपूर्ण बताया गया है.


क्यों करते हैं कन्या पूजन?

कन्या पूजन देवी दुर्गा के नौ रूपों की पूजा का प्रतीक माना जाता है. भक्त छोटी कन्याओं को देवी शक्ति का स्वरूप मानकर पूजते हैं. इसलिए उन्हें आदरपूर्वक आमंत्रित कर भोजन कराया जाता है और वस्त्र या उपहार भेंट किए जाते हैं. मान्यता है कि कन्या पूजन करने से मां दुर्गा का आशीर्वाद मिलता है और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है. कन्या पूजन केवल अष्टमी और नवमी तिथि को ही फलदायी माना जाता है.

कन्या पूजन को कंजक भी कहा जाता है.


2 से 10 साल की आयु की कन्याओं को दुर्गा माता के नौ रूपों का प्रतीक

कन्या पूजन में 2 से 10 साल की आयु की कन्याओं को दुर्गा माता के नौ रूपों का प्रतीक मानकर पूजा की जाती है और उन्हें भोजन कराया जाता है. साथ में एक बालक (जिसे लांगूर कहा जाता है) को भी शामिल किया जाता है, जो भगवान भैरव का प्रतीक होता है.

प्राचीन धार्मिक ग्रंथों में कन्या पूजन का विशेष महत्व बताया गया है. मार्कण्डेय पुराण के अनुसार, अष्टमी और नवमी तिथि पर कन्याओं का पूजन करने से पापों का नाश होता है और देवी दुर्गा की असीम कृपा प्राप्त होती है. देवी भागवत पुराण में उल्लेख है कि देवी के स्वरूप के रूप में कन्याओं का पूजन करने से मोक्ष और आध्यात्मिक उन्नति की प्राप्ति होती है.

ऐसा माना जाता है कि नवरात्रि में कन्याओं का पूजन करने से घर में सुख, शांति और समृद्धि आती है. इसे करने वास्तु दोष और पारिवारिक कलह भी दूर होती है. माना जाता है कि कन्या पूजन करने से देवा मां प्रसन्न होती हैं और सुख-समृद्धि और संतान सुख का आशीर्वाद देती हैं.

कन्या पूजन की विधि --

नवरात्रि के दौरान, 2 से 10 वर्ष की आयु की नौ कन्याओं को आमंत्रित करें.उन्हें आदरपूर्वक आसन पर बिठाएं और उनके पैर धोकर शुद्ध करें. इसके बाद, चंदन, कुमकुम, फूल और अक्षत से तिलक लगाएं. कन्याओं को देवी मां की चुनरी ओढ़ाई जाती है. उन्हें भोजन में हलवा, पूरी, चना और अन्य सात्विक व्यंजन परोसा जाता है. पूजा के बाद, कन्याओं को वस्त्र, उपहार या दक्षिणा देकर विदा किया जाता है.

     हिंदू पंचांग के अनुसार, आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी 29 सितंबर को शाम 04.31 बजे आरंभ हो रही है, जो 30 सितंबर को शाम 06.06 बजे समाप्त होगी. इसके बाद नवमी तिथि आरंभ हो जाएगी, जो 01 अक्टूबर को रात 7.01 बजे तक है.

कन्याओं के पैर धोने के लिए थाली, साफ जल और साफ कपड़ा या तौलियां, महावर या अलता से पैर को रंगे.

कुमकुम लगाएं,अक्षत छींटे, आसन, कपड़ा या चटाई पर बिठाएं, पूजा थाली में घी का दीपक से आरती करें,

भोजन में खीर-पूड़ी या गुड़-चना या अन्य मिष्ठान खिलाएं अंत में पहार दें कर ही विदा करें.

 

 

30 सित. 2025

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