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कैसे दोधारी तलवार बन गया है बिहार में शराबबंदी,महिलाएं गदगद, तो डोल रहा पुरूषों का मन,क्या भारी पड़ेगा नीतीश के लिए यह मुद्दा ?   

  • लेखक की तस्वीर: Upendra Gupta
    Upendra Gupta
  • 10 नव॰ 2025
  • 2 मिनट पठन

न्यूज डेस्क

पटना ( PATNA) : बिहार विधानसभा के लिए पहले चरण का मतदान के बाद दूसरे चरण के लिए मतदान 11 नवबंर को है. पहले चरण में जिस तरह रिकार्ड मतदान हुई, उसमें महिलाओं की भागीदारी सबसे अधिक मानी जा रही है. ऐसा ही रिकॉर्ड मतदान दूसरे चरण में भी उम्मीद की जा रही है. एनडीए की जीत हुई और नीतीश सरकार यदि फिर से सत्ता में लौटी तो साफ हो जाएगा कि नीतीश सरकार बनाने में महिलाओं की महत्वपूर्ण भूमिका है.यानि बिहार की महिलाएं नीतीश के साथ है.





बिहार में शराबबंदी से महिलाएं खुश तो पुरूष नाराज

बिहार में शराबबंदी जब से लागू हुआ,तब से अब तक बिहार की महिलाएं काफी खुश है, लेकिन पुरूषों में नाराजगी है. अब भी पुरूष नीतीश से शराबबंदी हटाने की मांग करते हैं. पुरूष वर्ग शराबबंदी कानून को व्यक्तिगत आज़ादी पर हमला मानते हैं. जबकि महिलाएं घर की शांति और सुरक्षा का प्रतीक मानती हैं. मतलब साफ है कि शराबबंदी ने हर घर में बंटवारा कर दिया है. इसलिए 2025 के चुनाव में शराबबंदी एक कानून के तौर पर नहीं बल्कि राजनीति के साथ भावनात्मक और सामाजिक मुद्दा बन चुका है.  

नीतीश कुमार की सबसे बड़ी चुनौती

राजनीतिक रूप से देखें तो यह मुद्दा नीतीश कुमार की सबसे बड़ी चुनौती बन चुका है. उनका वोट बैंक, जो कभी “सुशासन बाबू” के नाम से एकजुट था, अब ‘शराबबंदी बनाम आज़ादी’ की बहस में बंट चुका है. बीजेपी, जेडीयू, जनसुराज और सीपीआई(एमएल) सभी दल जानते हैं कि इस बार बिहार की शराबबंदी सिर्फ कानून नहीं, बल्कि हर घर का चुनावी एजेंडा बन चुकी है. जहां एक तरफ नीतीश इसे अपनी “नैतिक विरासत” मानकर बचा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ यह वही नीति है जो उनके राजनीतिक भविष्य को डांवाडोल कर सकती है.इसलिए यह माना जा रहा है कि शराबबंदी का फैसला अब नीतीश के लिए चुनावी रण में एक दोधारी तलवार बन गया है. शराबबंदी ने महिलाओं को उनके पक्ष में खड़ा कर दिया है, तो पुरूषों को विरोध में. हालांकि विकास और विधि-व्यवस्था के नाम पर पुरूष नीतीश के साथ ही दिखते हैं.  

 सरकारी राजस्व का भारी नुकसान पर घरेलू हिंसा में कमी

2016 में लागू हुई बिहार की शराबबंदी नीति से सामाजिक स्तर पर कई बदलाव लाए. घरेलू हिंसा कम हुई, परिवार की आय में सुधार आया और महिलाओं को नीतीश में “घर की इज्जत लौटाने वाले नेता” के रूप में देखने लगीं. लेकिन दूसरी ओर, इसी नीति ने प्रशासनिक और आर्थिक मोर्चे पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं. राज्य को शराब से मिलने वाला हजारों करोड़ रुपये का उत्पाद शुल्क बंद हो गया, जबकि काला बाजार और तस्करी का नेटवर्क और मजबूत हुआ. लेकिन इससे पुलिस की मनमानी, तस्करी और राजस्व के नुकसान ने सरकार की नैतिक छवि को चोट पहुंचाई है.

शराबबंदी कानून को लेकर विपक्ष हमलावर

शराबबंदी के मुद्दे ने बिहार के राजनीतिक परिदृश्य को भी दो हिस्सों में बांट दिया है. जहां जेडीयू (JDU) इसे “नैतिक सुधार” बताकर बचाव कर रही है, वहीं सीपीआई(एमएल) और प्रशांत किशोर की जनसुराज पार्टी खुले तौर पर कह चुकी हैं कि सत्ता में आने पर वे इस कानून को खत्म करेंगी.




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