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पेसा अधिनियम में आदिवासी समाज की सामाजिक, धार्मिक और परंपरागत व्यवस्थाओं को पूर्ण मान्यता : कांग्रेस

  • लेखक की तस्वीर: Upendra Gupta
    Upendra Gupta
  • 8 जन॰
  • 2 मिनट पठन

न्यूज डेस्क

रांची ( RANCHI) : पूर्व मुख्यमंत्री एवं प्रदेश भाजपा अध्यक्ष बाबूलाल मरांडी द्वारा पेसा नियमावली को लेकर दिए गए बयान पर तंज कसते हुए झारखंड प्रदेश कांग्रेस कमेटी मीडिया विभाग के चेयरमैन सतीश पौल मुंजनी ने कहा कि न केवल तथ्यहीन है, बल्कि आदिवासी समाज के बीच भ्रम, भय और अविश्वास फैलाने की एक सुनियोजित राजनीतिक साजिश है. यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि जो लोग अपने लंबे शासनकाल में पेसा कानून लागू करने का साहस तक नहीं जुटा सके, वे आज उसी पेसा पर ज्ञान देने का ढोंग कर रहे हैं.

गठबंधन सरकार स्पष्ट करना चाहती है कि पेसा नियमावली संविधान, सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों, हाई कोर्ट की टिप्पणियों, व्यापक जन-परामर्श और सभी सांसदों-विधायकों के विमर्श के बाद तैयार की गई है. यह नियमावली आदिवासी स्वशासन को कमजोर नहीं, बल्कि उसे संवैधानिक मजबूती प्रदान करती है.

जानबूझकर फैलाया जा रहा है भ्रम

संथाल समाज सहित 35 आदिवासी जातियों की आस्था और पूजा-पद्धति पर हमले का झूठा आरोप लगाना भाजपा और बाबूलाल मरांडी की पुरानी आदत रही है. यह कहना कि पेसा नियमावली आदिवासी विरोधी है, सरासर झूठ है. पहली बार ग्राम सभा को स्पष्ट कानूनी अधिकार, संरचना और प्रक्रिया दी गई है, ताकि पेसा केवल कागज़ों तक सीमित न रह जाए.

परंपराओं पर झूठा हंगामा

संविधान और पेसा अधिनियम में आदिवासी समाज की सामाजिक, धार्मिक और परंपरागत व्यवस्थाओं को पूर्ण मान्यता दी गई है. नियमावली में इन्हें कमजोर करने का कोई प्रावधान नहीं है. शब्दों की जानबूझकर गलत व्याख्या कर यह प्रचार करना कि सरकार आदिवासी परंपराओं को खत्म करना चाहती है, आदिवासी समाज के साथ सीधा छल है. प्रशासनिक ढांचे में जवाबदेही तय करना ग्राम सभा को कमजोर करना नहीं, बल्कि उसके निर्णयों को प्रभावी ढंग से लागू कराने की व्यवस्था है.

जल–जंगल–जमीन पर सरकार की प्रतिबद्धता अडिग

यह आरोप कि सरकार ने जल, जंगल और जमीन से ग्राम सभा को दूर कर दिया है, पूरी तरह निराधार है. पेसा के तहत ग्राम सभा को सामुदायिक संसाधनों के संरक्षण, प्रबंधन और उपयोग में निर्णायक भूमिका दी गई है. लेकिन बाबूलाल मरांडी को शायद अराजकता और अव्यवस्था ही स्वशासन नजर आता है.

झारखंड बने 25 वर्ष हो चुके हैं. इन वर्षों में सबसे अधिक समय तक भाजपा और बाबूलाल मरांडी ने शासन किया, लेकिन तब आदिवासी हितों और पेसा कानून की उन्हें याद नहीं आई. आज जब गठबंधन सरकार पेसा नियमावली को धरातल पर उतार रही है, तो भाजपा के पेट में दर्द हो रहा है. उन्हें साफ दिख रहा है कि झारखंड में भाजपा की राजनीतिक जमीन खिसक रही है, इसलिए पेसा पर झूठ फैलाकर जनता को गुमराह किया जा रहा है.

 

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