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शेर पर सवार होकर मां चंद्रघंटा ने महिषासुर राक्षस का किया था वध, उनकी घंटी से कांपते थे असुर  

  • लेखक की तस्वीर: Upendra Gupta
    Upendra Gupta
  • 24 सित॰ 2025
  • 2 मिनट पठन

 न्यूज डेस्क  

 रांची  ( RANCHI) :  नवरात्र के तीसरे दिन मां चंद्रघंटा की पूजा-अर्चना की जाती है. धार्मिक मान्यता है कि घर में मां चंद्रघंटा के आगमन से सुख-शांति का आगमन होता है. चंद्रघंटा माता को स्वर की देवी भी कहा जाता है, जो सिंह पर सवार होकर असुरों और दुष्टों को दूर करती हैं. 

 मां के घंटे की ध्वनि से दुष्ट, दैत्य और राक्षस रहते थे भयभीत

नवरात्रि के तीसरे दिन व्रती को मां चंद्रघंटा की पूजा के दौरान व्रत कथा का पाठ जरूर करना चाहिए. नवरात्रि के तीसरे दिन मां चंद्रघंटा की कथा के अनुसार, महिषासुर नामक एक शक्तिशाली राक्षस ने स्वर्गलोक में आतंक मचाना शुरू कर दिया और वह तीनों लोकों पर अपना अधिपत्य जमाना चाहता था. महिषासुर के बढ़ते आतंक से सभी देवता चिंतित हो गए थे और उन्होंने त्रिदेव यानी ब्रह्मा, विष्णु और महेश से मदद मांगी. देवताओं की व्यथा सुनकर त्रिदेव बहुत क्रोधित हुए और उनके क्रोध से एक दिव्य ऊर्जा प्रकट हुई. इस ऊर्जा से मां दुर्गा के चंद्रघंटा स्वरूप का जन्म हुआ, जिनके मस्तक पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र है. इसी वजह से उनका नाम चंद्रघंटा पड़ा.

मां के घंटे की ध्वनि से दुष्ट, दैत्य और राक्षस भयभीत रहते हैं. यही ध्वनि भक्तों को प्रेत-बाधा और नकारात्मक शक्तियों से सुरक्षित रखती है. विश्वास किया जाता है कि जैसे ही भक्त माँ का ध्यान करता है, वैसे ही यह दिव्य ध्वनि उसकी रक्षा के लिए गूंज उठती है.

माता ने महिषासुर राक्षस का वध किया

भगवान शिव ने मां चंद्रघंटा को अपना त्रिशूल भगवान विष्णु ने अपना चक्र और देवराज इंद्र ने अपना घंटा प्रदान किया. इसके बाद अन्य सभी देवताओं ने भी मां को अपने-अपने अस्त्र-शस्त्र दे दिए. फिर मां चंद्रघंटा महिषासुर से युद्ध करने पहुंचीं और माता ने अपने अस्त्र-शस्त्रों के साथ महिषासुर का वध किया, जिससे देवताओं को उसके आतंक से मुक्ति मिली.



मां को केसर की खीर लगाएं भोग में

चंद्रघंटा की पूजा में उन्हें केसर मिलाकर खीर का भोग लगा सकते हैं। मां को केसर की खीर प्रिय मानी गई है। इसके साथ ही पूजा में उन्हें लौंग, इलायची, पंचमेवा और दूध से बनी मिठाई भी अर्पित की जा सकती है। इसके साथ ही आप देवी की कृपा प्राप्ति के लिए उन्हें कमल, गुलाब, बेला या चमेली के फूल भी अर्पित कर सकते हैं।


 

 

 

 

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