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रेलवे की कछुआ चाल : ट्रेनें चल रही लेट, 9 महीने में 200 मी.बना सड़क-नाली, बिना नक्शा के बन रहा स्टेशन

17 सित. 2025

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न्यूज डेस्क

चक्रधरपुर ( CHAKRDHARPUR) : पीएम मोदी के कार्यकाल में लगभग हर केंद्रीय मंत्रालय की विकास कार्य तेज रफ्तार में चल रहा है, जिसमें रेलवे भी शामिल है, लेकिन भारतीय रेलवे के ही चक्रधरपुर रेल मंडल में रेलवे की रफ्तार कछुए की रप्तार से भी धीमी है. हालात यह है कि चक्रधरपुर रेल मंडल में यात्री ट्रेनों के प्रवेश करते ही रफ्तार कछुए से भी धीमी हो जाती है और घंटों लेट होती है. इतना ही विकास के मामले में चक्रधरपुर रेल मंडल की रफ्तार काफी धीमी है. अमृत भारत स्टेशन योजना का हाल बेहद निराशाजनक है. जिस परियोजना को स्टेशन को आधुनिक रूप देने के लिए शुरू किया गया था, वह अब तक केवल मौखिक दावों और वादों तक सीमित दिख रही है. नौ महीने बीत चुके हैं, लेकिन स्टेशन के कायाकल्प का कोई मास्टर प्लान ही तैयार नहीं हुआ. यही नहीं, अधिकारियों के पास यह तक स्पष्ट जवाब नहीं है कि स्टेशन परिसर में कौन-सी नई सुविधाएँ बनेंगी और कब तक यह काम पूरा होगा.


बिना नक्शा तोड़फोड़, यात्रियों पर सीधा असर

18 जनवरी को रेलवे ने विकास के नाम पर एक झटके में स्टेशन परिसर की 38 लाइसेंसी दुकानों को ढहा दिया. यह कहते हुए कि जल्द ही स्टेशन आधुनिक सुविधाओं से लैस होगा. मगर आज स्थिति यह है कि नौ महीनों में केवल 200 मीटर सड़क और एक नाली का निर्माण हुआ है. काम की रफ्तार इतनी धीमी है कि स्थानीय लोग इसे “कछुए की चाल” से भी धीमी कह रहे हैं. नतीजतन स्टेशन परिसर आज वीरान पड़ा है. यात्रियों को भोजन सहित अन्य ज़रूरी सामान के लिए स्टेशन से दूर भागना पड़ रहा है, जबकि ट्रेनों की लेटलतीफी पहले ही लोगों की परेशानी बढ़ा रही है.

 रेलवे की स्वीकारोक्ति और जनता का गुस्सा

रेलवे जनसंपर्क अधिकारी आदित्य चौधरी का बयान स्थिति को और गंभीर बना देता है. उन्होंने स्वीकार किया कि चक्रधरपुर स्टेशन के विकास का अब तक कोई अधिकृत नक्शा तैयार नहीं है. यह स्वीकारोक्ति खुद रेलवे की कार्यशैली पर बड़ा सवाल खड़ा करती है. जब योजना ही तय नहीं थी तो दर्जनों परिवारों की रोज़ी-रोटी क्यों छीनी गई? क्या यह जनता के साथ छल नहीं है?

 अधिकारियों पर सीधे आरोप, जवाबदेही की मांग

स्थानीय लोग और रेल यात्री अधिकारियों पर जमकर निशाना साध रहे हैं. उनका कहना है कि रेलवे के अधिकारी एसी कमरों में बैठकर फैसले लेते हैं और ज़मीनी हकीकत से पूरी तरह कटे रहते हैं. विकास कार्यों की कोई स्पष्ट समय सीमा नहीं है, न ही कामकाज की पारदर्शिता. लोग सवाल उठा रहे हैं कि क्या यह पूरा अभियान सिर्फ़ रेलवे बोर्ड को खुश करने के लिए दिखावा है?

 अमृत भारत या अधूरा भारत?

लोगों का आरोप है कि यह योजना “अमृत भारत” नहीं, बल्कि “अधूरा भारत” बनकर रह गई है. स्टेशन परिसर का पुराना ढांचा तोड़ दिया गया, दुकानदारों की आजीविका खत्म हो गई, और यात्रियों की सुविधा की जगह उनकी मुश्किलें बढ़ा दी गईं. रेल यात्री कहते हैं कि अधिकारी खुद कभी हालात का जायजा नहीं लेते, जबकि आम लोग दिन-रात इसका खामियाजा भुगत रहे हैं. रेल मंडल में अधिकारी तीन साल के लिए आते हैं और चक्रधरपुर को नयी मुसीबत में झोंक कर चले जाते हैं.

 नतीजा अराजकता और अनिश्चितता

आज चक्रधरपुर स्टेशन पर विकास का कोई रोडमैप नहीं, कोई समय-सीमा नहीं. यात्रियों को मजबूरी में स्टेशन से दूर जाकर खाना और ज़रूरी सामान खरीदना पड़ रहा है और भागते-भागते ट्रेन पकड़नी पड़ती है. लोग साफ़ कह रहे हैं कि जब तक जिम्मेदार अधिकारी सामने आकर जवाब नहीं देते और ठोस काम शुरू नहीं होता, यह योजना यात्रियों के लिए सिरदर्द बनी रहेगी.

 स्थानीय नागरिकों की मांग है कि रेलवे तत्काल एक स्पष्ट योजना और समय-सीमा घोषित करे, ताकि स्टेशन विकास का काम जल्द पारदर्शी के साथ एक रोड मैप के साथ शुरू हो सके और जनता को हो रही परेशानियों से राहत मिले. फिलहाल चक्रधरपुर स्टेशन की सच्चाई यही है कि अमृत भारत के नाम पर बिना नक्शे का विकास मंडल मुख्यालय के स्टेशन का हो रहा है, जिसका खामियाजा आम रेल यात्रियों और दुकानदारों को भुगतना पड़ रहा है.

17 सित. 2025

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